पहले भी शीर्ष न्यायालय ने महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर भस्म और अन्य लेपन से हो रहे प्रभाव पर कुछ दिशा निर्देश दिए थे. बाद में चर्चा होने पर कोर्ट ने अपना आदेश ये कहते हुए संशोधित किया था कि पूजा अर्चना और सेवा भोग कैसे हो ये तय करना हमारा काम नहीं है. ये तो मन्दिर प्रबन्धन और पुरोहितों पुजारियों को ही तय करने दिया जाये. 

मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने मन्दिर प्रबन्धन को दिशा निर्देश जारी किए हैं. इसमें भक्तों के प्रवेश और अन्य उपचार को लेकर विस्तार से निर्देश हैं. कोर्ट के निर्देश जल्दी ही वेबसाइट पर आएंगे.

दरअसल, जस्टिस अरुण मिश्रा बुधवार को रिटायर होने वाले हैं. सोमवार को उन्होंने प्रशांत भूषण अवमानना केस (Prashant Bhushan Case) समेत चार मामलों में फैसला सुनाया था. मंगलवार को महाकालेश्वर मंदिर के प्रबंधन को लेकर आदेश सुनाने से पहले AGR मामले पर भी फैसला सुनाया. 

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने ही 2018 में दिशानिर्देश दिए थे, जिनका अब संशोधित, परिवर्धित और आधुनिक रूप आया है. उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर के शिवलिंग के मामलेे में अक्टूबर 2018 में कोर्ट ने मंदिर प्रशासन को 8 सुझावों पर अमल करने को हरी झंडी दी थी. श्रद्धालु 500 ML से ज्यादा जल नहीं चढाएंगे. जल सिर्फ RO का होगा. भस्म आरती के दौरान शिवलिंग को सूखे सूती कपडे से पूरा ढका जाएगा. अभी तक 15 दिनों के लिए आधा ढका जाता था. अभिषेक के लिए हर श्रद्धालु को 1.25 लीटर दूध या पंचामृत चढाने की इजाजत होगी. 

 इसके अलावा, शिवलिंग पर शुगर पाउडर लगाने की इजातत नहीं होगी बल्कि देसी खांडसारी के इस्तेमाल को बढावा दिया जाएगा. नमी से बचाने के लिए गर्भ गृह में  ड्रायर व पंखे लगाए जाएंगे. बेल पत्र व फूल पत्ती शिवलिंग के ऊपरी भाग पर ही चढ़ाए जाएंगे ताकि शिवलिंग के पत्थर को प्राकृतिक सांस लेने में कोई दिक्कत ना हो. शाम पांच बजे के बाद अभिषेक पूरा होने के बाद शिवलिंग की पूरी सफाई होगी और इसके बाद सिर्फ सूखी पूजा होगी. अभी तक सीवर के लिए चल रही पारंपरिक तकनीक ही चलती रहेगी क्योंकि सीवर ट्रीटमेंट प्लांट  के बनने में लंबा समय लगेगा.

 सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ASI, जियोलाजिकल और याचिकाकर्ता से आपत्ति या सुझाव भी मांगे थे. लेकिन इसके बाद जब अगली सुनवाई नवम्बर 2018 के आखिरी हफ्ते में हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन समिति को तुरंत वो नोटिस बोर्ड हटाने को कहा जिसमें लिखा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पूजा के नए नियम बनाए गए हैं. 

कोर्ट ने कहा कि ये आदेश कभी नहीं दिया कि धार्मिक अनुष्ठान कैसे किए जाएं और ना ही ये कहा कि भस्म आरती कैसे हो. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कोर्ट को मंदिर और पूजा के रीति रिवाजों से कोई लेना देना नहीं है. कोर्ट ने ये मामला सिर्फ शिवलिंग की सुरक्षा के लिए सुना और एक्सपर्ट कमेटी बनाई. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर मंदिर प्रबंधन समिति ने ये प्रस्ताव पेश किए थे. सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर इस मामले में मीडिया गलत रिपोर्टिंग करता है या पक्षकार मीडिया में गलत बयानी करता है तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई की जाएगी.

जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ के फैसले में कोर्ट ने रसायन, ASI और अन्य सम्बन्धित विशेषज्ञों की एक्सपर्ट कमेटी और मन्दिर प्रबन्धन कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर अहम निर्देश जारी किए हैं. मन्दिर और विशेषज्ञ यानी दोनों कमेटी ने माना है कि शिवलिंगम पर उखड़ती परत साफ दिखाई पड़ती है. बाकी तरफ भी क्षरण ही हो रहा है. ऐसी ही लापरवाही की वजह से ओंकारेश्वर शिवलिंगम को काफी नुकसान हो चुका है. लिहाज़ा अब ये सजग और सतर्क होने का समय है. 

दिशा निर्देश अब इस तरह होंगे- भस्म आरती के दौरान शिव लिंगम पर महीन कपड़ा ढंका रहेगा. उसकी धुलाई RO तकनीक से शोधित पानी से ही होगी. कोई भी श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग पर हथेलियां या कुछ भी रगड़ें नहीं. भस्म आरती के दौरान भस्म के pH लेवल का ध्यान रखा जाए. भस्म की क्वालिटी में सुधार का खास तौर पर ध्यान रखने की ताकीद सुप्रीम कोर्ट ने की है ताकि ज्योतिर्लिंग पर पपड़ी उतरने जैसा कोई प्रतिकूल असर ना पड़े. ज्योतिर्लिंग पर श्रृंगार के समय पहनाई जाने वाली चांदी की भारी भरकम मुंडमाल और नाग के आकार के सर्प कर्ण कुंडल और मुकुट किरीट का वजन भी जहां तक संभव हो कम किया जाए. 

पीठ ने मन्दिर कमेटी को ये भी सुझाव दिया है कि क्या यह संभव है कि धातु की वजनी मुंडमाल, मुकुट और कर्णाभरण को ज्योतिर्लिंग से स्पर्श कराए बिना ही श्रृंगार का अंग बनाया जा सके. यानी शिवलिंगम से थोड़ा हटा कर ही श्रृंगार किया जाए. विशेषज्ञ कमेटी ने ये पाया है कि ज्योतिर्लिंग को पंचामृत अभिषेक के दौरान दूध के अलावा दही, घी, शक्कर और शहद रगड़ने से भी नुकसान पहुंचता है. ऐसे में मंदिर कमेटी ने भी सहमति जताई है कि पंचामृत अभिषेक मन्दिर कमेटी की ओर से ही सिर्फ नियमित पूजा के दौरान किया जाए. सभी सामग्री सीमित मात्रा में हो और शुद्ध हो. 

मन्दिर कमेटी की ओर से होने वाली पारम्परिक और नियमित पूजा के अलावा कोई भी श्रद्धालु पंचामृत अभिषेक नहीं करेगा. पुजारी, जनेऊ पति, खुटपति और सेवायत पुरोहित या उनके अधिकृत प्रतिनिधि ये सुनिश्चित करें कि कोई भी श्रद्धालु किसी भी सूरत में शिवलिंगम को रगड़ें नहीं. ऐसा होने पर सेवायत पुजारी, पुरोहित ही इसके उत्तरदायी होंगे.  

सिर्फ मन्दिर कमेटी की ओर से होने वाली पारम्परिक नियमित पूजा के दौरान ही अभिषेक के दौरान शिवलिंगम को हल्के हाथों से रगड़ सकते हैं. 

कोर्ट ने गर्भगृह में होने वाली पूजा, अभिषेक, श्रृंगार, भोग, आरती दर्शन सेवा की 24 घंटे वीडियो रिकॉर्डिंग सुनिश्चित कराने और अगले छह महीने तक उसे सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया है. इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले पुजारी, पुरोहित के खिलाफ मन्दिर कमेटी समुचित कार्रवाई करने को अधिकृत है. मन्दिर कमेटी ही महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग पर दुग्ध अभिषेक के लिए शुद्ध दूध श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराएगी. कहीं से भी लाया गया दूध अर्पित नहीं किया जा सकेगा.  जलाभिषेक के लिए भी मन्दिर परिसर में मौजूद कोटि तीर्थ सरोवर से शोधित जल जिसका pH स्तर नियमित हो उसका ही प्रयोग हो ये सुनिश्चित किया जाए. 

रुड़की स्थित संस्थान CBRI के विशेषज्ञों की टीम मन्दिर का दौरा कर अपनी रिपोर्ट देगी जिसमें व्यवस्था को और ज़्यादा उपयोगी और सुरक्षित बनाने के सुझाव भी हो सकते हैं. कोर्ट ने अगले छह महीनों में रुद्र सागर प्रोजेक्ट के इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट फेज एक और दो के बारे में उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड से अगले छह महीनों में प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तलब की है. 

कोर्ट ने उज्जैन के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से मन्दिर परिसर के 500 मीटर के दायरे में किसी भी अवैध निर्माण या कब्जे को फ़ौरन हटाने के इंतजाम करें और 15 दिसंबर तक कोर्ट को रिपोर्ट दें. मन्दिर परिसर के अंदर आधुनिक सुविधाओं के नाम पर किए गई निर्माण को भी विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर फौरन ध्वस्त किया जाए. 

अब इस मामले को अगले साल जनवरी के दूसरे हफ़्ते में आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की बात भी कोर्ट ने अपने फैसले के आखिर में लिखी है.

बता दें कि जस्टिस अरूण मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित होने वाले उनके विदाई समारोह में शामिल होने से मना तो किया साथ ही यह भी कहा कि कोरोना संकट काल के मद्देनज़र वह समारोह का आयोजन नहीं चाहते क्योंकि उनकी अंतरात्मा इसकी अनुमति नहीं देती है.

वीडियो: ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन’ में जस्टिस अरुण मिश्रा ने की PM मोदी की तारीफ


 



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